हिन्‍दी वाद -विवाद प्रतियोगिता (विषय :- " क्या समाज के सर्वांगीण विकास में महिला आरक्षण क्रांतिकारी कदम है ?")

"दुनिया मेहनत कर रही है अगुआ होने के लिए और भारत में लोग मर रहे हैं पिछड़ा होने के लिए"

आदरणीय निर्णायक मंडल। * के सभागार में उपस्थित श्रोता गण। आप सभी को मेरा नमस्कार। मैं * हिंदी पखवाड़े के उपलक्ष्य में आयोजित वाद विवाद के विषय "क्या समाज के सर्वांगीण विकास में महिला आरक्षण क्रांतिकारी कदम है" के विरोध में अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित हूं।

विगत सप्ताह हम सभी के घर में बप्पा आए, साथ ही मिला लोकतंत्र के मंदिर को एक नया ठिकाना और वहां पारित किए जाने वाला पहला प्रस्ताव बना नारी शक्ति वंदन अधिनियम- २०२३।
इस विधेयक में महिलाओं को लोकसभा और विधान सभाओं में ३३ प्रतिशत आरक्षण देने की बात की गई है।

यह कोई पहला अवसर नहीं जब महिला आरक्षण के हक में संविधान में संशोधन किया जाएगा। तकरीबन ३० वर्ष पहले सन् १९९२ में ७३वें व ७४वें संशोधन विधेयक द्वारा पंचायती राज संस्थानों एवं शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं को ३३% आरक्षण दिया गया।

किंतु विडंबना देखिए। इसी ऐतिहासिक संशोधन की वर्षगांठ मनाते हुए २४ अप्रैल २०१५ को माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को देश से आह्वान करना पड़ा सरपंच-पतिवाद की स्थिति समाप्त करने के लिए।

हमारे आसपास ऐसे खूब उदाहरण मिलते हैं जहाँ कहने को प्रधान महिला है परंतु शासकीय कार्यों की बागडोर सरपंच-पति, सरपंच-देवर, मेयर-पति, यानि महिला के किसी पुरुष रिश्तेदार के हाथों में है। चुनाव से पहले वोट मांगने से लेकर कुर्सी हाथ आने के बाद भी महिला प्रतिनिधि को पीछे रखा जाता है।

२०२० में आयी पंचायत नमक वेब सिरीज़ में इसे भली भांति दर्शाया गया जहां गांव की प्रधान मंजू देवी राष्ट्रगान तक गाने में भी असमर्थ हैं क्योंकि उन्हें कभी मौका ही नहीं मिला। हर साल उनके पति तिरंगा फहराते रहे। न इस बात से मंजू देवी को आपत्ति थी, न ही गांव वालों को। लेकिन यह ज़रूर हो सकता है कि जिस दिन स्वयं अपने कार्यालय पर आकर बैठे तो गांव वाले उन के पति को बुलाने की मांग करें।

भारत के पितृप्रधान मानसिकता वाले समाज में महिलाओं को नेता या किसी शीर्ष पद पर स्वीकार कर पाना आज भी एक बड़ी चुनौती है और इस चुनौती का सामना करने के लिए जबरदस्ती समाज पर महिला प्रतिनिधियों का थोपा जाना एक क्रांतिकारी कदम तो कतई नहीं कहा जा सकता।

जिस तरह समाज का एक बड़ा वर्ग brain-drain यानि प्रतिभा पलायन के लिए जाति आधारित आरक्षण को जिम्मेदार मानता है, लिंग आधारित आरक्षण दिए जाने के बाद वही वर्ग महिलाओं के प्रति भी अपना दुष्प्रचार करने में पीछे नहीं हटेगा।

हमेशा से ही महिलाओं को रोज़गार के क्षेत्र में ग्लास सीलिंग यानि एक अदृश्य सीमा का सामना करना पड़ता रहा है। योग्यता होने के बावजूद सामाजिक प्रभाव के लिए एक पुरुष को आगे चुना जाता है। महिलाओं को आरक्षण देना इस दिशा में उन के और विरुद्ध जा सकता है जहां राजनीति के क्षेत्र में ऊपर उठना उनकी योग्यता का प्रमाण नहीं, अपितु आरक्षण की देन माना जाएगा।

चुनाव के समय उन्हें तानों का सामना करना होगा। यहां तक कि सामान्य सीटों पर उनकी उम्मीदवारी का विरोध स्वयं उनके पार्टी वालों की तरफ़ से देखने को मिलेगा। बिना आरक्षण के उनका चुनाव लडना वर्तमान से भी ज्यादा मुश्किल सिद्ध होगा। राजनीति के क्षेत्र में ग्लास सीलिंग महिलाओं के लिए और मजबूत हो जाएगी जिसे तोड़ने के लिए वर्तमान से कहीं अधिक प्रयास करना होगा और यह कदम महिला सशक्तिकरण के लिए कहीं अधिक घातक सिद्ध होगा।

भारतीय संविधान नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता हैं। संविधान के सिद्धांतों पर चलते हुए हमे यह सुनिश्चित करना होगा की महिलाओं को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक हर क्षेत्र में समान भागीदारी मिले। फोर्ब्स की सबसे अमीर १०० भारतीयों की सूची में आखिर ६ महिलाएं ही क्यूं हैं? इसके लिए क्या हमे फोर्ब्स की सूची में भी आरक्षण का प्रस्ताव लाना होगा? नहीं। अपितु हमें ज़मीनी स्तर पर हालत सुधारने होगी। महिलाओं को बेहतर शिक्षा के मौक़े देने उपलब्ध कराने होंगे। महिलाओं की कार्यबल में प्रतिभागिता सुनिश्चित करनी होगी।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की रिपोर्ट के अनुसार पिछले ३ साल में ३१ लाख नौकरियों की कमी आई है। और इन में से २६ लाख सिर्फ महिलाओं की नौकरियां गई हैं।

ऐसी आर्थिक स्थितियों में चुनाव से चंद महीनों पहले संसद में महिलाओं को आरक्षण देने की बात करना महज एक चुनावी जुमला भी प्रतीत होता है। 

बिना आरक्षण के भी हमें स्वंत्रता से पहले श्री मति कादम्बिनी गांगुली, श्री मति सरोजिनी नायडू और आज़ादी के बाद सुश्री मायावती, सुश्री ममता बनर्जी और सुश्री जयललिता जैसी महान राजनेत्रियां देखने को मिली हैं। जाहिर है महिलाओं को संबल बनाने के लिए केवल आरक्षण की दरकार नहीं।

वर्षों से महिलाओं को आरक्षण दिए जाने की बात हो रही है। कई बार प्रस्ताव भी पेश किए गए परंतु कोई सफल न हो सका। एक बार फिर चुनावी मौसम से पहले यह मुद्दा उठाया गया है। हालांकि तकनीकियों पर ध्यान दिया जाए तो अगले दो लोकसभा चुनाव तक महिलाओं को आरक्षण देना संभव नहीं लग पा रहा है।

अंत में अपनी वाणी को विराम देते हुए मैं यही कहना चाहूंगी की महिलाओं को सशक्त करने के लिए सरकार उनके कौशल विकास, आर्थिक सहभागिता और सुरक्षा पर ध्यान दे तो कहीं अधिक ईमानदार कोशिश कही जाएगी। 
अन्यथा कहीं यह न हो कि महिला आरक्षण केवल दो पेंशन हासिल करने का एक ज़रिया मात्र बन जाए। धन्यवाद।

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